नई दिल्ली. राजधानी की ओबोहवा आम तौर पर साल भर खराब रहती है. लेकिन इस साल पुराने रिकॉर्ड टूट गए. लॉकडाउन में दिल्ली वालों को साफ हवा मिल रही है. नई पीढ़ी में शायद ही किसी को याद होगा कि यहां पर इतनी शुद्ध हवा पिछली बार कब मिली थी. ग्रीनपीस की एक रिपोर्ट के मुताबिक 24 मार्च से 4 अप्रैल तक पिछले साल की तुलना करें तो इस साल देश के सबसे प्रदूषित 25 शहरों में पीएम 2.5 करीब 22 से लेकर 70 फीसदी तक कम हो चुका है. दिल्ली में 57.64 फीसदी की कमी आ गई है. इससे साल के औसत प्रदूषण में भी कमी होने का अनुमान है.
पर्यावरणविद् एन. शिवकुमार कहते हैं कि लॉकडाउन में ज्यादातर शहरों की हवा शुद्ध हो चुकी है. ज्यादातर लोग बता नहीं पाएंगे कि दिल्ली-एनसीआर में इतनी शुद्ध हवा लोगों को कब मिली थी. अगर हम हर महीने 24 घंटे सबकुछ बंद रखें तो कम से कम सभी को साफ हवा मिलेगी. लोगों की लाइफ बढ़ेगी. दवाईयों का खर्च बचेगा.
औसत पीएम 10, 2.5 चार साल से सामान्य नहीं
प्रदूषण बढ़ाने वाले सबसे बड़े कारक पीएम-10 का सामान्य लेवल 100 माइक्रो ग्राम क्यूबिक मीटर (MGCM) जबकि पीएम 2.5 का 60 एमजीसीएम होता है. केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने 2016 से 2018 तक औसत पीएम-10 और 2.5 का विश्लेषण किया है. जिसमें पता चलता है कि तीनों साल भी यह समान्य स्तर पर नहीं रहा. जबकि 2019 में सिर्फ दो दिन ही प्रदूषण मैप ग्रीन हुआ था. इस साल लॉकडाउन में 28 मार्च को मेरठ का पीएम 2.5 सिर्फ 12.91 था. जो लॉकडाउन के दौरान प्रदूषित शहरों में सबसे कम था.
ग्रीन पीस के सीनियर कैंपेनर अविनाश चंचल का कहना है कि लॉकडाउन की वजह से निश्चित तौर पर प्रदूषण का स्तर काफी कम हुआ है लेकिन यह स्थायी समाधान तो है नहीं. लॉकडाउन के बाद जब कॅमर्शियल गतिविधियां शुरू होंगी तो फिर स्थिति जस की तस हो जाएगी. इसलिए हमें प्रदूषण कम करने का सही और लांग टर्म समाधान खोजना होगा.